आओ बातें करे

Monday, August 23, 2010

रक्षाबंधन की शुभकामनाएं



ये डोर युगों से रक्षा का सूत्र रहा है
पहली बार देवराज इंद्र को उनकी पत्नी इंद्राणी ने
श्रावण पूर्णिमा पर बांधी थी ये डोर
जब वो लड़े थे असुरों से
वक्त बदला, बांधने और बंधवाने वाले बदले
पर ये डोर आज भी रक्षा का सूत्र है
बलाओं से बचाता है भाई और बहन को
बनाए रखता है प्रेम के इस अटूट बंधन को
रक्षाबंधन की शुभकामनाएं

Sunday, July 25, 2010

नियति भी कुछ है

एक डोर
कई गिरहें

सुलझाने की असंख्य कोशिशें

धटता-बढता अधूरापन

मौत का डर

जिंदगी की आस

सपनों की प्यास

ख्वाहिशों की तलाश

हम क्यों भूल जाते हैं

नियति भी कुछ है

इन सब के दरम्यान

Monday, June 14, 2010

दुबे जी का जागरण

पिछली सर्दियों में अनायास दुबे जी से मुलाकात हुई । एक राष्ट्रीय अखबार में दुबे जी पत्रकार हैं और बड़े पद पर हैं । बड़े पद पर हैं इसलिए उन्हें बड़ा पत्रकार भी माना जाता है । खैर, तब मेरे लिए बेरोजगारी का दौर था और मैं एक पुराने दोस्त से मिलने अखबार के ऑफिस गया था । बात ही बात में पता चला कि अगर दुबे जी प्रसन्न हो गए तो मुझे इस अखबार में नौकरी मिल सकती है । मेरे मित्र ने मुझे बगैर किसी सूचना या सावधानी के दुबे जी के सामने छोड़ दिया। चेहरे पर पनपी हुईं दाढ़ी से दुबे जी के प्राक ऐतिहासिक होने का भय होता था। कपड़े पहनने का अंदाज साफ बता रहा था कि दुबे जी को पैंट शर्ट जैसी आधुनिक पोशाक से बड़ी कोफ्त है। दुबे जी जब मुझसे मिले उस वक्त उन्होने अपने पिचके हुए मुंह को पान के बीड़े से फुला रखा था। घड़ी दो घड़ी में उनका हाथ शरीर के अलग अलग अंगों को खुजाने में लग जाता था । खैर दुबे जी ने मुझे हिकारत से और मैनें दुबे जी को बड़ी हैरत से देखा। दुबे जी ने पूछा- “कहां काम करते थे”
मैनें कहा – इलेक्ट्रॉनिक में था सर
दुबे जी मुझे दोबारा ऊपर से नीचे तक देखा । फिर पूछा - “अब अखबार में क्यों”
असली बात छुपाकर मैने कहा – सर वहां शोर बहुत है और काम कम ।
“लेकिन यहां दाम कम है भाई” – दुख और व्यंग्य को फेटकर दुबे जी ने कहा । कुछ काम और बेकाम के सवाल पूछकर दुबे जी ने मेरे हाथ में एक खबर पकड़ाई और कहा – “बन्धुवर इस खबर पर जरा स्क्रीप्ट लिख दें”
खबर पंजाब के एक गांव की थी- एक गधा अपनी मेहनत से मालिक के खेतों को आबाद करता है और मालिक का परिवार एक साल से बड़ी खुशहाल जिन्दगी गुजार रहा है ।
गधे और उसकी बेचारगी को किसान की चालाकी से जोड़कर मैनें एक स्क्रीप्ट लिख मारी। लेकिन हल खींचते गधे का बिम्ब हास्य से इतना भरपूर था कि भाषा जरा मजाकिया हो गयी । और यहीं बात दुबे जी को अखर गईं।
“अरे ये बड़ा संवेदनशील मुद्दा है भाई...गधे की मेहनत को आप मजाक समझते हैं...आपको इस देश के सिस्टम और सरकार पर लिखना चाहिए...आखिर सरकार की नजर गधों की दुर्दशा पर क्यों नहीं जाती...आपने उसकी मासूमियत पर ध्यान दिए बगैर उसकी दशा पर व्यंग्य लिख दिया है...कमाल करते हैं आप..."
भावावेश में दुबे जी और न जाने क्या बोलते, लेकिन मुंह के पान ने ज्यादा बोलने नहीं दिया । दो-चार बार मुंह दाएं-बाएं हिलाकर चौबे जी ने कहा – नहीं चलेगा भाई। टीभी ने भाषा- विचार, खबर की समझ , सबका बंटाधार कर दिया है । जाइये भाई अखबार आपके बस का नहीं”-
इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता दुबे जी पान थूकने के लिए उठ गए और फिर देर तक नहीं दिखे। अपनी पढ़ाई - लिखाई को लानत देते हुए मैनें भी अखबार के ऑफिस को आखिरी प्रणाम किया। साथ ही तीसरी कसम के हीरामन की तरह पहली कसम खायी- आज के बाद किसी भी गधे को लेकर मजाक नहीं करूंगा ।

खैर कुछ दिन पहले दुबे जी से दूसरी बार मुलाकात हो गयी । इसबार एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल में। दुबे जी बड़े ही गर्मजोशी से मिले । मैनें पूछा – सर आप यहां ?
“हां न्यूज हेड से मुलाकात करने आया था...दरअसल एक तरह से इंटरव्यू है...सर ने भरोसा दिया है कि इस बार कुछ करेंगे...लगता है आप भी नौकरी के लिए आएं हैं”- दुबे जी बोले ।
मैने कहा- “मेरी बात जाने दीजिए, आप कैसे टीभी में काम करेंगे...यहां तो खटारा लोग काम करते हैं”
दुबे जी बोले –“आपकी बात ठीक है , लेकिन क्या करें भाई...जरूरत इतनी है और उतने पैसे से काम नहीं चलता...आपकी भाभीजी ने जीना दुभर कर रखा है...समझ लीजिए कि बड़ी दिक्कत है ...और इसमें क्या है...जैसी ठसक के साथ प्रिंट में काम किया,वैसे ही इलेक्ट्रॉनिक को भी हांक ले चलेंगे...बल्कि हमारे जैसे लोगों के आने से आपलोगों की भाषा-वाषा ठीक हो जायेंगी...हें-हें-हें...और रही बात खबर की तो वो दोनों जगह से नदारद है-क्या हिन्दी के अखबार और क्या हिन्दी के चैनल...अब तो कमाना- खाना है”
मैनें मन ही मन दुबे जी प्रणाम किया। उनके जागरण पर शुभकामनाएं दी और मिलते रहने का वादा करके अपनी राह पकड़ी।

Friday, June 11, 2010

कोई छोटी कर दे मेरी जिंदगी

जिंदगी बहुत लंबी लगती है...
उस रोज छोटी लगी थी
खिड़की के बाहर परिदों सी उड़ती हुई...
बजड़ों सी आसमान में बहती हुई
न आसमा बदला...न बदली है खिड़की
फिर कैसे लंबी हुई ये जिंदगी
क्या था वो जो इसे खिंच कर लंबा कर गया
कोई छोटी कर दे मेरी जिंदगी
अंदर वैसे भी सिमटी हुई है
बाहर से भी कतर दे कोई....

Saturday, May 29, 2010

आओ गूथ जाए...मेरी नई कोशिश

सात साल बाद पोस्टर पर मिली...


यूं तलाश कभी खत्म नहीं हुई थी...पर मैं उसे उन जगहों पर ढूंढ़ने भी नहीं गया था...जहां वो मिल सकती थी...मुझे तो उससे वैसी ही जगह मिलना था...जहां हम मिले या फिर मिल सकते थे...क्योंकि दोस्ती के कुछ कायदे होते हैं, कुछ उसूल होते हैं... कुछ गवाह होते हैं...वो निर्जीव चीजें ही क्यों न हो...रंगीन चासनी में डूबे बर्फ के गोले का एक दायां हिस्सा, सर्द सड़क की सुनसान हवा..दीवारों पर टंगे पोस्टर या आइना... या फिर मैगी की मैगिली खुशबू... इन चीजों के बगैर दोस्तों से मिलना अजनबी चेहरों से बेवजह टकराने भर होता है...ऐसे में पुराने दिन पूरी तरह लौटते नही...दिन नए होते हैं बिल्कुल...और तलाश आखिरकार बेजा और जिंदगी अधूरी ... जिंदगी अगर मुक्तसर होती तो मैं तलाश नहीं करता है...लेकिन ऐसा है नहीं ...जिंदगी लंबी है...पुराने दोस्तों के बगैर तो ये और भी लंबी हो जाती है...हम सभी की जिंदगी कई टुकड़ों में इधर-उधर बंटती जाती है...कभी कभार उन्हें इकट्ठा करने का मन करता है ...सो ढूंढ़ने लगते हैं जिंदगी के उन टुकड़ों को जो किसी मुहाने पर बहकर हमसे अलग हो गए होते हैं...ऐसे में अपने जिंदगी के टुकड़ों को तलाशना कहीं से भी गलत नहीं लगता है...अब मालूम नहीं मेरी तलाश पूरी होगी या नहीं...मैं उन सारे टुकड़ों को वापस पा सकूंगा, जिसे वो लोग अपने साथ ले गये थे...जो आये तो अपनी मर्जी से थे और गये भी अपनी मर्जी से....पर इतना जानता है...मैं तलाशता रहूंगा...और यूं कभी पोस्टर पर तो कभी कहीं और उन से मिलता रहूंगा...उन्हें बताए बगैर....ताकि उनके होने और न होने के बीच तलाश के पुल पर जिंदगी चलती रहे...

Friday, October 17, 2008

कुछ लम््हों और कुछ लोगों की बातें

पता नहीं कितनी चीजें याद आएगी

कभी अासमान ओढ़कर अचानक टकराना याद आएगा

तो कभी वे सुबहें याद आएंगी

वो काफी की गुजारिशें याद आएंगी

उसका एक दिन पूरा होना याद आएगा

वो छुपकर देखना याद आएगा

खुदा के इबादतों से पल याद आएगे

एक पांव की पायल याद आएगी

वो राधा का इंतजार याद आएगा

वो खुदा याद आएगा

खुदा न बनने की बातें याद आएगी

सिर्फ याद ही आएंगी, सिर्फ याद....


अपनी मुस्कुराहट के पीछे

कितना कुछ छिपा लेते हैं हम

दर्द, एहसास और ख्याल

और न जाने क्या क्या

बगैर ये सोचे

आंखे आइना होती हैं

हमारे जज्बातों की

हमारे ख्यालों की



कभी कॉफी टेबल पर

तो कभी रेस्तरां में

हम बीतते हैं

कभी सड़कों पर

तो कभी ढाबे पर

हम जीते हैं

कभी रात तो

कभी सुबहों तक

हम साथ होते हैं

अपनी तन्हाई

अपनी रुसबाई लिए



तुम्हारी आंखों में झांकने को जी चाहता है

वो जो खारा पानी बर्फ बन गया है तुम्हारी आंखों में

उसे पिघलाने को जी चाहता है

एक घूंट पीने को जी चाहता है



बकबक करती है

दूसरों को कुछ समझाती

चेहरे पर हल्की सी फीकी मुस्कराहट के पीछे

अपने गम को छुपाती

अपनी दुनिया में सिमटी

चुपके से

और की दुनिया में झांकती

वो लड़की कुछ कहती है

अपनी खामोशी से


Saturday, October 4, 2008

बस यूं ही ख््याल आया

हम कभी जन्मे थे...?

जिंदगी का एक और बसंत देखा मैंने....खूशनसीब हूं मैं क्योंकि जानता हूं इस दुनिया में हजारों लोग ऐसा करने से पहले ही दुनिया से विदा हो जाते हैं....अजीब एहसास होता है खुद के होने का...दिन तो दिन होते है...हर दिन अपने अंदर कुछ गिने-गिनाए घंटे समेटे होता है...जन्मदिन भी उन्हीं दिनों में से एक होता है...लेकिन हमारा जन्म िदन हमारे लिए स्पेशल हो जाता है...जबकि जन्म लेने के एहसास हमारे अंदर नहीं होता है....लाख चाहकर भी हम महसूस नहीं कर सकते कि जन्म लेते वक्त हमने क्या महसूस किया था,क्या सोचा था, कैसे हंसे थे...हकीकत तो ये है कि खुद कि बनावट देखकर या खुद के होने के बीच इस बात को जेहन में उतारना मुश्किल लगता है कि हम कभी जन्में होंगे...हमे लगता है हमारे जन्म की घटन हमसे जुड़ी हुई नहीं है... वो हमारे साथ हुई ही नहीं, हमारा जन्म कोई आकाशीय घटना थी,  जिसके अब हमारा सरोकारो नहीं रह गया...मैं सच की बात नहीं कर रहा हूं, ये सच है कि हम सब जन्म लेते हैं, इस सच्चाई को नकारा भी नहीं जा सकता है....मैं बात कर रहा हूं खुद के जन्म लेने के एहसास की...इस मामले में हमारा चेतन बिल्कुल खाली होता है... अगर कुछ चीजे हमारी चेतन में होती है तो वो दूसरो की कही बाते और जो बड़े होकर अपने में जो सच्चाई देखते हैं अपने जीवन में...फिर ऐसे में जन्मदिन मनाना बेतुका लगता है...अगर मस्ती करनी है, जीवन का आनंद लेना है तो कई और तरीके हैं, उधार की एहसासों और दुनिया के बने बनाए फ्रेम में जीने से शायद ज्यादा बेतहर...

Monday, September 15, 2008

शिवराज पाटिल जी के नाम...



आदरणीय शिवराज पाटिल जी....जिस तरह से कुछ खबरियां चैनलों ने अापके सफाई पसंद व्यक्तित्व पर उंगली उठाने की हिमाकत की है...उससे मैं बेहद आहत हुआ हूं...आखिर क्या बुराई अगर हमारे देश के गृहमंत्री एक दिन में तीन बार कपड़े बदलते हैं. वो भी तो देश के दूसरे नेताओं के तरह ही हैं. अगर दूसरे नेता डिजानर सूट पहन सकते हैं तो हमारे देश के गृहमंत्री को भी ये आजादी होनी चाहिए कि वो एक दिन में तीन बार कपड़े बदल सके...दरअसल खबरियां चैनल इस बात को नजरअंदाज कर देते हैं कि इन दिनों देश का हर नेता सफाई पसंद हो गया है...खबरियां चैनल अगर देश के नेताओं के लिबास पर नजर ठीक से डाले तो उन्हें हर नेता सफेदी और सफाई का पैगाम लिए नजर आएगा...गृहमंत्री के सफाई पसंद आदत पर उंगली उठाने से पहले न्यूज चैनल ये क्यों भूल गए कि हमारे गृहमंत्री भी सफाई पसंद नेताओं की जमात से तालुल्क रखते हैं. फिर उनके कपड़ो पर पाबंदी क्यों. दरअसल शिवराज पाटिल जी ये खबरियां चैनल आपके व्यक्तित्व को ठीक से समझ नहीं सके हैं...वो नहीं जानते विकट से विकट अगर परिस्थियों में अापके चेहरे पर भावशुन्यता विखरी रहती है तो उसका राज क्या है..सीधी सी बात है अाप देश के गृहमंत्री हैं और गृहमंत्री की जिम्मेदारियां निभाने के लिए इमोशनल होने की गुंजाइश नहीं होती. अगर विस्फोट में मारे गए लोगों के लिए अापके आंखों में आंसू आ जाएगा या फिर संवेदना नजर आ जाएगी तो आतंकवादियों को लगेगा कि आप कमजोर पड़ गए हैं जिसके बाद उनका हौंसला और बढ़ जाएगा..खबरियां चैनल ये भी नहीं समझ पाते कि कपड़े बदलने से इंसान तरोताजा रहता है और उसका दिमाग ठीक से काम करता है. विस्फोट की साजिश रचने वाले को पकड़ने के लिए जरूरी है कि दिमाग तरोताजा रहे...अाप 13 तारीख के दिन तीन बार कपड़े बदलकर वही तो कर रहे थे आप. आखिर ये खबरियां चैनल समझते क्या अपने अाप को...किसी और के घर में झांकने से पहले उन्हें अपने गिरेबान में झांकना चाहिए...जिस टीवी एंकर को देखो वो चेहरा पर लीपापोती करके टीवी पर नजर आता है...खबर चाहे जैसी भी हो...हालांकि इसमें कुछ पत्रकारों को अलग ऱखा जा सकता है, जो चेहरे पर धूल पसीना लिए रिपोरिंग करते नजर आते हैं िकसी बड़े हादसे के समय...ये खबरियां चैनल न तो अापको समझ पाएं हैं और ना ही िहन्दुस्तािनयों को....आखिर समझेंगे भी कैसे...पत्रकारों की आधी जमात तो हिन्दुस्तानियों की उस जमात से वास्ता रखती है िजसका सफाई से कुछ खास लेना देना नहीं होता....गरीबी और मुफलिसी की जिंदगी जीने वाले और उसके बारे में लिखने वाले ये पत्रकार क्या जाने कि जिंदगी में सफाई कितनी जरूरी चीज है...वो जानते ही नहीं हिन्दुस्तान बदल गया है, पूरा नहीं बदला तो एक छोटा सा हिस्सा जरूर बदल चुका है जो िहन्दुस्तानी संवेदना को कब का दफन कर चुका है... 

नीरज सारांश